इन कटीली तारों के बीच से उस पार जब देखता हूँ,
अमन कि राह ढुढंते मासुमो को पाता हुँ,
जब बढता है वह हाथ मुझसे हाथ मिलाने को खुद ही दो कदम पिछे आता हुँ,
पता है इन्सा है वह मेरी तरह
पर फर्ज के आगे मजबुर हो जाता हूँ,
देखा है उस चमन में भी फुल मैनें गुलाब का उस चमन में भी वही फुल वही कांटा है,
पर मजहब के नाम पर इन् दरींदो ने हमे दो भागो मे बांटा है।
©शिवा चौधरी,जळगाव
सीमा सुरक्षा बल
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