सोमवार, 7 सितंबर 2015

और् बदनाम मैं ही होती हूँ

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और बदनाम मैं ही होती हूँ ।
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गंदा है पर धंदा है, पर हमारे लिये फांसी का फंदा है।
कुछ दरींदो ने ठगा प्यार कि नाम पर,
और लाकर छोडा कोठे के द्वार पर ।
दिल भरते ही अपना हमें खाई मे धकेला है,
फिरभी समाज में उन्ही का बोलबाला है।
सारी रात मेरा ही बदन नुचने का दर्द सहती हूँ,
और बदनाम मैं ही होती हूँ ।

ईच्छा से ना तुम यहाँ आते हो ना मैं यहाँ आती हूँ,
तु हालात का मारा प्यास बुझाने आता है,
और मैं तेरे ही बिस्तर पर परोसी जाती हूँ।
तु जिस पैसे से जिस्म की भुक मिटाता है,
मै उन्ही पैसो से पेट कि आग बुझाती हूँ।
मैं भुक तेरी मिटाती हूँ, और बदनाम मैं ही होती हूँ ।

कुछ दरींदो ने नौकरी के नाम पर लाया,
तो कुछ ने पैसो कि चकाचौंध भरी जिन्दगी से बहलाया ।
पहले तो अत्याचार खूब हुआ मुझ पर,
और सुलाया झुटमुट के  सुहाग के सेज पर ।
भागने कि कोशिश भी खूब कि,
पर सफलता  हाथ न आयी।
मन मारकर इस जिंदगी से समझौता किया,
रात तो रात सुहागदिन भी मनाया ।
प्यास उनकी मिटाती हूँ, और बदनाम मैं ही होती हूँ ।

मैं भी सोचती हूँ शादी करु घर बसाऊँ,
अपने पति से औलाद पाकर मॉ कहलाऊँ ।
पर यह सिर्फ एक ख्वाब बनकर रह जायेगा,
पर कौन हमे अपनायेगा कौन गले लगायेगा,
और कौन इस दलदलसे बाहर लायेगा।
हर रात नये पति के साथ सोती हूँ,
शायद इसी लिये मैं बदनाम होती हूँ ।

© शिवा चौधरी(प्रहार)
जामनेर, जलगांव

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