शनिवार, 12 सितंबर 2015

कुर्सी (हिंदि कविता)

*****   कुर्सी   *****

मुझे पाने कि चाहत में लढ़ने लगे ।
रिस्तो को भी दांव पर लगाने लगे ।
बंद कमरे में षढ़यंत्र रचाने लगे ।
खुद लाख बुरे सहि पर औरों को निचा दीखाने लगे ।

बरसों से इनकी धुर्तता को जाना मैनें ।
वादों से मुकरने कि फितरत को पहचाना मैनें ।
बंद कमरों कि गुप्तगूं को जाना मैनें ।
दंगे करवाने वालो कि शकलों को पहचाना मैनें ।

फोडो और राज करो इस् नीति के ये अंग्रेजो से अंग्रेज है ।
कितना भी हो नालायक पर अपने ही खुन को मुझे सौपनें का इनका क्रेज है ।

पढ़ लिख ले ए इनसान तु ।
राजपाट चलाने का सहि तरीका जान् तु ।
कुर्सी नहीं मैं तो इनकी जान् हू ।
खोकले आदर्शो कि बस शान हू ।

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