मंगलवार, 6 अक्टूबर 2015

इज़हार

°``°``°`` °``°``°`` °``°``°`` °``°``°
                  इज़हार

मेरे शायरीं के लब्ज़ ,
दिल की बातें बयां करती हैं।
शायद इसलिये यारों,
वह मेरे गली सें गुजरा करती हैं।

जब मैं गुमसूम रहता था,
तब गलीयों में उसे देखा ही नहीं।
और बोलने लगा शायराना अंदाज में,
तब उसने अपने आप को रोका ही नहीं।

वह नैन मटक्का करती  रही,
मैं बस शरमाता रहा।
हर दिन गली से गुजरते वक्त,
प्यार से उसे ताकता रहा।

पर एक दिन भी हिम्मत न आयी,
कि उससे इज़हार करु गुमनाम से प्यार का।
कि सपना देखू जिंदगीभर साथ जुटाने,
ऐसी गुलज़ारसी नार का।

आज़ तो उसने हद कर दी ,
बेधडक मेरें व्दार पर दस्तक दे दीया ।
मैं इज़हार करना चाहता था आज़,
पर उसने हाथ में शादी का कार्ड रख दिया।

टूट गया दिल मेरा उसकी इस हरकत सें,
मैनें बस शरमाके नजरें झुका ली।
भाई के शादी कार्ड हैं ओ सनम कहकर,
खुद ही इज़हार कर के चल दी।

     शर्मिला आशिक

°``°``°`` °``°``°`` °``°``°`` °``°``°

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें