घमंड
हर कोई यहाँ खोटे सिक्के चलाने लगे है |
बंजर जमीं मे भी कमल खिलने लगे है |
कल तक घुम रहे थे नंगे ही रस्तों पर
आज कपडे पहनने का सलिका सिखाने लगे है
परसो देखा था उन्हे नाक रगडते कलाई से
आज बाबु बनते ही रुमाल पकडाने लगे है
चुपके से अंधेरे में दस्तक देते है कोठो के व्दार
दिन में सभाओं में सत्संग सुनाने लगे है
नजरों से ही लूट लेते थे हुस्न किसी गोरी का
आज लगातार घुरने का कलम पढाने लगे है
काला धन खाकर फुला ली है तोंद मुस्तंडो सी
कही हाजमोला तो कही युनो ढूंढने लगे है
मत भूल घमंड मे ये यारा ये तेरी ही जागीर नही
तुझसे भी बडे धुरंदर यहाँ पनपने लगे है
शिवा चौधरी
जामनेर,जळगांव
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