वंदे मातरम् !
आज़ादी के सही मायने
सारा देश खो बैठा है....
कोई धरम के कोई कौम के
फतवे लेकर ऐठा है ।
अरे सोचो हमने कैसे तुमको
दिलवायी थी आज़ादी ,
और लढ लढ के आपस ने तुम
करने चले हो बरबादी ।
लढ़ रहा था कंधे से कंधा लगाये
वह गोलियों के बौछार में,
छोड़ गया बदनसीब वह
हम यारों को मझधार में ....
ऐसे में भी कोई न यारों
हममें से वहाँ रोया था,
आँखे नम थी शहादतपर
एक बुंद ना आंसू गिराया था ।
क्योंकि.....
दाँव लगी थी इज़्ज़त उसकी
जो भारत माँ कहलाती है,
वही अंत समय में सब धर्मों को
गोद मे पनाह दिलाती है ।
सोयें थे वह और देखा हमनें
उन बेवाओं की सुनी माँग को,
मासूमों की किलकारीयाँ
और बुढों की लडखडाती टांग को....
भूल गये हो भगत सिंह तुम
भूल गये जालियन वाले बाग कों,
और गुमनामी के अंधेरे वाले
भूल गये हो नेताजी सुभाष कों....
दर्द सहते छूट गयें साल सत्तर पिछें
तुम सन सैंतालीस मे लटकें हो,
अंतरिक्ष की सैर करके भी
वंदे मातरम् में ही अटके हो ।
लढ़ना तुम्हारा काम नहीं
तुम विश्वास करो उन विरों पर...
जो तुम्हारी अमन के ख़ातिर
खड़े है लाइन जिरो (0) पर.....
लढ़ मेरे सपूत लेंगे
बस एक बिनती तुमसे करता हूँ,
बंद करो यह आपस की उलझन
क्योंकि हर रोज़ यहाँ मैं मरता हूँ ।
शिवा चौधरी
जामनेर,जलगाँव
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